Saturday, 29 April 2017

Meaning and Definitions of Business in Hindi

ü व्यवसाय का अर्थ (Meaning of Business)
      ‘Business’ का अंग्रेजी शब्दकोश के अनुसार अर्थ है The State of Being Busy अर्थात् ‘व्यस्तता’ | इंसान अपने पुरे जीवन कल में दो प्रकार के क्रियाओं में व्यस्त रहता है |
  1. आर्थिक क्रियाएँ,
  2. गैर-आर्थिक क्रियाएँ

            ये जानना जरुरी है की व्यवसाय में केवल आर्थिक क्रियाओं को ही सामिल किया जाता है | गैर-आर्थिक क्रियाओं का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं होता केवल आत्म-सन्तुष्टि, समाज कल्पना आदि उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है | इसे व्यवसाय में सामिल नहीं किया जाता है | राष्ट्र सेवा, समाज सेवा, धर्म प्रचार अदि भी गैर-आर्थिक क्रियाएँ हैं | इसके ठीक विपरीत आर्थिक क्रियाओं से आशय ऐसे क्रियाओं से है जो मुख्य रूप से पैसा कमाने के लिए की जाती है एवं जिनसे व्यक्ति के आवश्यकताओं की पूर्ति करने में मदद मिलती हैं | जैसे :- दुकानदारों द्वारा विभिन्न प्रकार के सामान का विक्रय, किसानों द्वारा अनाज का उत्पादन, कारखानों में विभिन्न प्रकार के वस्तुओं का निर्माण आदि |
ü व्यवसाय की परिभाषाएँ (Definitions of Business)
        विभिन्न विद्वानों ने व्यवसाय के विभिन्न प्रकार के परिभाषाएँ दी हैं | जिनमें से कुछ आधुनिक परिभाषाएँ इस प्रकार हैं |
  • उर्विक के अनुसार, ”व्यवसाय एक ऐसा उपक्रम है जो समुदाय के सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु वस्तुओं एवं सेवाओं को बनाता है |”

              "Business is an enterprises which makes, distributes or provides any article or service which other members of the community need."
  • बेयार्ड ओव्हीलर के अनुसार, “व्यवसाय एक ऐसी संस्था है जोकि निजी लाभ की प्रेरणा के अन्तर्गत समाज की वस्तुओं और सेवाओं को उपलब्ध कराने के दृष्टिकोण से संगठित एवं परिचालित की जाती है |”

                 "Business is an institution organized and operated to provide goods and services to society under the incentive of private gain."

अतः यह कहा जा सकता है, “व्यवसाय की परिभाषा के अंतर्गत वे सभी आर्थिक क्रियाएँ आती हैं जो वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन तथा वितरण के लिए की जाती हैं एवं जिनका उद्देश अपनी सेवाओं द्वारा समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करके लाभ कमाना होता है तथा जो निजी अथवा सार्वजनिक संस्थाओं में स्वतंत्र होकर एवं नियमित रूप से की जाती हैं |”

Wednesday, 26 April 2017

पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप क्या है?

सार्वजनिक निजी साझेदारी
(Public Private Partnership)
सार्वजनिक क्षेत्र तथा निजी क्षेत्र के साथ मिलकर सार्वजनिक सेवाएँ प्रदान करता है और वित्तिय तकनिकी तथा परिचालन जोखिमों को वहन करता है | इस प्रकार सार्वजनिक निजी साझेदारी सरकार तथा एक या अधिक निजी क्षेत्र कम्पनियों के साथ मिलकर काम करती है | इसे P3 या PPP के नाम से जाना जाता है | PPP सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्र के मध्य एक दीर्घकालीन साझेदारी है | वर्तमान में सरकार आधारभूत ढाचें के निर्माण के लिए कुछ क्षेत्रों में PPP का प्रयोग कर रही है |
प्रबंध क्या है ? जानने के लिए click करें |
a)  शिक्षा (स्कूल, कॉलेग, विश्वविद्यालय) |
b)  सड़क, रेलवे, मेट्रो इत्यादि |
c)   जल (एकत्र, सपाई, वितरण) इत्यादि |
d)  रद्दी माल को एकत्र कर फिर से उसे उपयोग करने क लिए |
सार्वजनिक निजी साझेदारी की विशेस्ताएँ :- PPPs की प्रमुख विशेस्ताएँ हैं :-
a)  PPPs का मुख्य उद्देश्य उच्च किस्म की सेवाएँ देने के लिए उस काम के निपुण व विशेषज्ञ को उपयोग में लाना |
b)  PPPs सरकार को उसकी बजटीय समस्या व उधार लेने की सीमओं से मुक्ति दिलाती है |
c)   PPPs जोखिम को सार्वजनिक व निजी क्षेत्र में विभाजित कराती है |
d)  PPPs सरकारी सेवाओं की किस्म तथा लागत के उत्तरदायी रहती है |
e)  PPPs परियोजनाएँ कार्य को कम से कम समय में पूरा करने में सहायक होती है |


Monday, 17 April 2017

प्रबंध क्या है ?


किसी भी कार्य को करने और कराने के लिए प्रबंध का होना आवश्यक है, दुसरे शब्दों में ये व्यक्तियों के साथ कार्य करने और कराने की कला है | प्रबंध के द्वारा हम किसी भी कार्य को करने का सबसे उत्तम एवं सस्ता उपाय क्या है जान सकते हैं, इसका उपयोग न केवल व्यापार में बल्कि सभी प्रकार के क्रियाओं में जहाँ मानवीय श्रम का प्रयोग होता है, किया जाता है | यह व्यवहार एवं रचनात्मक पर आधारित होता है | प्रबंध पूर्ण रूप से पेशा नहीं है लेकिन इसमें पेशे की कुछ विशेषताएँ भी है, इसका आकार पिरामिड जैसा होता है क्योकि जब हम उच्च स्तर से नीचे के स्तर की ओर चलते हैं तो क्रमचारियों की संख्या बढती चली जाती है | प्रबंध के माध्यम से हम बड़े से बड़े कार्य को आसानी से और कम समय में कर सकते हैं |

बैंक के विभिन्न खाते और उनके उपयोग जानने के लिए click करें |

Tuesday, 21 March 2017

पूँजीकरण

पूँजीकरण क्या है ?

पूँजीकरण का अर्थ व्यवसाय में पूँजी को एकीकृत या पूँजी के छोटे-छोटे टूकारे को इकट्ठा करने से है | बिना पूंजी के व्यवसाय का कल्पना भी नहीं किया जा सकता है जिस प्रकार रक्त धमनियों के बगैर शरीर का कल्पना नहीं किया जा सकता और रक्त धमनियों में रक्त का होना भी आवश्यक है | रक्त के बगैर रक्त धमनियों का कोई उपयोग नहीं हैं, उसी प्रकार पूँजीकरण व्यवसाय में पूँजी का होना भी आवश्यक है | जिस प्रकार ह्रदय का काम खून को साफ करने का होता है, ह्रदय गंदे हुये खून को साफ कर शारीर को अच्छा और स्वस्थ करते हैं | उसी प्रकार पूँजीकरण में व्यावसाय के लिए तीन प्रकार के पूँजी की आवश्यकता होती है |

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1.      इसका अर्थ खरीदे हुए माल से है, जो आपके पास व्यवसाय शुरु करने से पहले होना चाहिए |
2.      इसका अर्थ उधार पर बेचे गये माल से है, हर व्यवसायी को उधार पर माल बेचेने का साहस होना भी काफी आवश्यक है |
3.      इसका अर्थ पूँजी के चालू अवस्था से है, इसमें व्यवसाय को उस पूँजी के माध्यम से आगे बढाया जाता है | इससे माल की खरीद बिक्री की जाती है |

                  जिस व्यवसाय के पास तीनों तरह के पूँजी होती है वो व्यवसाय हमेसा चलता रहेगा और ऐसा होने के लिए व्यवसायी को साहसी होना आवश्यक है | जिन व्यवसायी  को इन पूँजी की कमी रहेगी उनका व्यवसाय ज्यादा तेजी से विकास नहीं कर सकता है | वो व्यवसाय रुक-रुक कार ही चलेगी और ऐसे व्यवसायी को असफल होने की सम्भावना भी अधीक होती है | व्यवसायी अपने व्यवसाय से ज्यादा लाभ कमाने में सफल नहीं हो पते हैं | जीस प्रकार शारीर में नए रक्त कोशिका नहीं बनने पर शारीर कई एक बीमारीयों से घिर जाता है | उसी प्रकार व्यवसाय में चालू पूँजी नहीं रहने पर व्यावसाये बीमारी ग्रस्त हो जाता है या होने की सम्भावना रहती है |

Saturday, 11 March 2017

साझेदार के प्रमुख अधिकार एवं कर्तव्य

एक साझेदार के निम्नलिखित अधिकार है :-

.  न्यायपूर्ण एवं विश्वास युक्त व्यव्हार
२. साझेदारी सम्बन्धी तथ्य जानना
३. कपटपूर्ण व्यव्हार से क्षतिपुर्ती करना
४. आपूर्ति काल में अधिकार
५. व्यवसाय के संचालन में भाग लेने का अधिकार
६. राय प्रकट करने का अधिकार
७. बहियों के निरीक्षण करने का अधिकार
८. लाभ में हिस्सा पाने का अधिकार
९. लाभों में से पूँजी पर ब्याज पाने का अधिकार
१०. फर्म की सम्पत्ति पर अधिकार

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एक साझेदार के निम्नलिखित कर्तव्य :-

१. एक दुसरे के प्रति न्याय निष्ट सहृदय होना
२. ठीक हिसाब देना
३. अधिकतम सर्वलाभ के लिए काम करना
४. कपटपूर्ण व्यव्हार से हानी की क्षतिपुर्ती करना
५.  हानी को बराबर अनुपात में सहन करना
६. निजी लाभ के प्रति हिसाब देना

७. अधिकार के सीमा के भीतर कार्य करना  


Friday, 10 March 2017

स्टॉक एक्सचेंज और इनके कार्य

स्टॉक एक्सचेंज आधुनिक व्यावसायिक जगत में बरा ही महत्वपूर्ण स्थान रखती है | किसी भी देश के स्टॉक एक्सचेंज बाज़ार उसके पूँजी बाज़ार में महत्वपूर्ण हिस्से होते है | संसार में इसका विकास संयुक्त पूँजी वाली कम्पनियों के जन्म तथा विकास के साथ प्रारम्भ हुआ लेकिन आधुनिक व्यवसाय प्रधान युग में यह एक अत्यंत महत्यपूर्ण संस्था बन गई है | यह वह संगठित विपनी है जहाँ कम्पनियाँ निगम अथवा सरकार द्वारा निर्गमित अंश का क्रय विक्रय किया जाता है, जो बेचने के दृष्टी से निर्गमित की गई हो | इस प्रकार आजकल औद्योगिक वित्त के ढ़ाचे को समझाने के लिए स्टॉक एक्सचेंज के कार्य प्रणाली का अध्यन करना आवश्यक है | 

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              साधारण शब्दों में स्टॉक एक्सचेंज का आशय एक ऐसे सुसंगठित व स्थायी बाजार से है, जहाँ संयुक्त स्टॉक वाली कंपनियां, सार्वजनिक व्यक्तिगत एवं जनोपयोगी संस्थाओ को शेयर का विक्रय करता है | स्टॉक एक्सचेंज एक प्रकार का वह बाजार है, जहाँ शेयर का क्रय-विक्रय निश्चित नियमों के अनुसार पहले से पंजीकृत शेयरों में ही होता है | स्टॉक एक्सचेंज न तो अपने लिए क्रय करता है, और ना ही अपने लिए शेयरों का विक्रय करता है | यह बाजार केवल क्रय-विक्रय की क्रियाओ को नियमित करता है |

स्टॉक एक्सचेंज के कार्य :-

१.  पूँजी रचना:- स्टॉक एक्सचेंज पर शेयर के भाव सम्बन्धी बातो का प्रकाशन नागरिकों को बचत के लिए प्रोत्साहित करता है, तथा जिनके पास बचत है, उनको शेयरों में लगाने के लिए प्रेरित करता है | इसका प्रभाव यह होता है की पूँजी की व्यवस्थित रचना होती है |

२.     पूँजी की तरलता तथा गतिशीलता :- स्टॉक एक्सचेंज का दूसरा महत्यपूर्ण कार्य एक और पूँजी को तरलता प्रदान करना तथा दूसरी ओर गतिशीलता लाना है | स्टॉक एक्सचेंज में शेयर का क्रय-विक्रय किसी भी समय किया जा सकता है, जिससे स्टॉक में तरलता आ जाती है अर्थात विनियोजक(शेयर होल्डर) किसी भी समय अपनी लगाई हुई पूँजी को वापस कार सकता है | यदि कोई शेयर कम कीमत वाली है, या कम लाभप्रद शेयर ख़रीदी जा सकती है, इस प्रकार शेयरों में गतिशीलता आ जाती है |

३.     तैयार एवं निरंतर बाज़ार :- स्टॉक एक्सचेंज का तीसरा कार्य बाजार तैयार करना एवं निरंतर उपलब्ध कराना है | इन बाजारों में हर समय क्रेता-विक्रेता पाये जाते हैं, जिससे बाजार में निरंतरता बनी रहती है |

४.     मूल्य निर्धारण :- मूल्य निर्धारण स्टॉक एक्सचेंज का चौथा महत्यपूर्ण कार्य है | स्टॉक एक्सचेंज पर शेयरों के मूल्यों का निर्धारण राजनैतिक, सामाजिक, रास्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पहलुओं को ध्यान में रखकार किया जाता है, ताकि उचित मूल्य निर्धारित हो सके क्योंकि शेयर लेने वाले अपने धन को उन्हीं शेयरों में लगाते हैं, जो उनके लिये अधिक लाभदायक हों |

५.     व्यवहार में सुरक्षा :- स्टॉक एक्सचेंज निश्चित नियमों के अंतर्गत कार्य करते हैं | जिससे जाली शेयरों के क्रय-विक्रय का भय ख़त्म हो जाता है, तथा साथ ही क्रय-विक्रय का ढंग तथा कमिशन भी उचित तारिके से निश्चित हो जाता है, ताकि उपभोक्ताओं में भी विश्वास पैदा हो | यदि कोई सदस्य स्टॉक एक्सचेंज के नियमो का पालन नहीं करता है, तो उसे दण्डित किया जा सकता है, तथा समय आने पर स्टॉक एक्सचेंज से निकाला जा सकता है | इस प्रकार स्टॉक एक्सचेंज नियोजक को सुरक्षा प्रदान करता है |

६.     अनुसूचित कंपनियों के बारे में पूर्ण जानकारी :- स्टॉक एक्सचेंज का एक कार्य अनुसुचित कम्पनी के बारे में आर्थिक सूचनायें एकत्रित करके उसका प्रकाशन करना है, ताकि सदस्यों को उस कंपनी के बारे में विस्तृत जानकारी हो सके | जो सूचनायें प्रकाशित न हुआ हो उनको भी अगर कोई सदस्य मांगे तो वह उसको दे दी जाती है |

७.     नयी पूँजी प्राप्ति में सहायक :- प्रायः कम्पनियाँ अपने विकास के लिए नयी पूँजी की आवश्यकता महसूस करती है | इसके लिए कम्पनियाँ जनता से नए अनसो का निर्गमन करती है ऐसा निर्गमन करके पूँजी एकत्रित करने में स्टॉक एक्सचेंज ‌‌‍बड़ी सहायता करते हैं |


८.     अर्थिक प्रगति का माप :- स्टॉक एक्सचेंज किसी भी देश की अर्थिक प्रगति का बैरोमीटर कहलाता है, क्योकि देश की अर्थिक प्रगती का अनुमान उस देश के स्टॉक एक्सचेंज को देखकर लगाया जा सकता है |

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